बोलो क्या मांगते हो? 

ये लो भाला,ये लो कृपाण

साथ में ये लो कट्टा भी

मारो और खूब मारो

तब तक मारना जब तक वीरता का प्रमाण न मिले

और वीर रस पर कसीदा न पढ़ा जाये

मचाओ हुड़दंग और खूब मचाओ

तब तक मचाओ जब तक सड़कें बंद न हों,

स्कूलों के गेट पर ताले न लगें

हुड़दंग मचेगा तभी तो राजनीति गिरेगी!

बोलो क्या मांगते हो ?



ये लो कैमरा,ये लो माइक

साथ में रख लो चेले भी

एक चेला सवाल पूछेगा

दूसरा चेला जवाब देगा

उधर गद्दी वाले मुस्करायेंगे

चिल्लाओ और खूब चिल्लाओ

तब तक चिल्लाना जब तक सुनने वाला कोई न हो

बहस करो और खूब करो

तब तक करना जब तक अभिनय दम न तोड़े

बहस होगी तभी तो मामला आगे बढ़ेगा!

बोलो क्या मांगते  हो ?



ये लो मोमबत्ती,ये लो पोस्टर

साथ में ये लो झंडा भी

भीड़ बढ़ाओ और खूब बढ़ाओ

तब तक बढ़ाना जब तक साहबज़ादे आर्डर न दें

नारे लगाओ और खूब लगाओ

तब तक लगाना जब तक वर्दी वाले गोले न छोड़ें

भीड़ कुटेगी तभी तो असली आंदोलन शुरू होगा!

बोलो क्या मांगते हो ? 



ये लो ट्विटर,ये लो फेसबुक

साथ में ये लो व्हाट्सएप्प भी

आक्रोश दिखाओ और खूब दिखाओ

तब तक दिखाना जब तक ट्रेंड खत्म न हो

लिखो कटाक्ष और गढ़ो भाषण

तब तक लिखना जब तक क्लेश न हो,

या कीबोर्ड पर आपदा न आन पड़े!

अरे डालो लांछन, मारो ठप्पा

जब तक मुद्दा कुछ और रूप न लेले

खोलो इतिहास और गिनाओ दंगे

मारो तथ्य,बचाओ विचारधारा

और हां, ट्रोल करना मत भूलना!

बोलो क्या मांगते हो ? 



बस दो चेलों की जेल? 

वो जो छूट जाएंगे? 

जिन्हें छूटने पर फूलों से सजा पथ मिलेगा? 

एक फ़ाइल जो कभी भी बंद हो जाएगी? 

जिसे बस एक टी•वी कार्यक्रम के में सिमटा दिया जाएगा? 

अरे सुनते हो!

चुनाव आने वाला है! 

बोलो क्या मांगते हो? 

His screams


His screams

Amplifying the magnitude of chaos

Dwells into sorrows

Bewildering the vocal masters

All thunderstruck,all numb


His screams

Devouring his lungs

Sends shivers to a billion spines

Causing catastrophic desire

Quenching the parched souls


His screams

Weaving roars of uprising

Chides the wall of resurgence

Spanning umatched rhythms

Instigating rush in nerves


His screams

Looping in the hinged minds

Reverberates in the shattered hearts

Transcending limited emotions,

Discovering the  buried flames


His screams

Cultivating teenage playlist

Immortalises the “Chaz” legend

Amidst all legends

Unresting in the memoirs,written in chords.



Roar in paradise,legend!

वो जो देख सकते हैं.

​प्यार।
इस शब्द की थाह,संकल्पना मेरी समझ से परे है। 

अनायास लिख लेता हूँ इस विषय पर ,किन्तु इस बात की पुष्टि तो स्वयं मैं भी नहीं कर सकता कि मुझे पहले कभी प्यार हुआ है या नहीं ।

शायद इसमें मेधा का कोई लेना-देना नहीं होता,पर मुझे क्या मालूम ? मैं ठहरा एक सादा सा प्राणी जिसे इस भाव से वंचित रहना रास आया और कभी ख़ास कोशिश भी नहीं की अपनी “भ्रमचारी” अवस्था बदलने की।

सच कहूं तो मुझे जो चीज़ दिखती है मैं उसे ही स्वीकारता हूँ।फिर चाहे कोई मेरी नास्तिकता पर भौं सिकोड़े,या समाज में यथेष्ट रूप से अच्छाई न दिखने पर निराशावादी की उपाधी दे,मोये फर्क न पड़ता भाईसाब।

मुझे प्यार नहीं दिखता। 

मुझे दिखाई देता है तो सिर्फ जालसाज। इन नकाबपोशों की मुहब्बत को सिर्फ दूसरे नकाबपोश या अपनी ज़िंदगी से ख़फ़ा हो चुके बहके लोग ही भाव दे सकते हैं ,मैं नहीं।

बस बचते हैं तो कवि,ये वो सितम के मारे लोग हैं जिनकी मुहब्बत मुकम्मल नहीं हुई,होती तो कवि कैसे बनते जनाब। मैं अपने आप को कवि नहीं मानता क्योंकि इसका मेनस्ट्रीम कल्चर मेरे लिए नहीं बना,और सच कहूं तो मेरे बस की भी नहीं है। बहुत ईमानदार और हिम्मत वाले हैं ये लोग जो अपने अंदर की त्रासदी को बेजोड़ परोसते हैं।इन्होंने पचड़े खाये हैं, पापड़ बेले हैं और बदले में बस खीज ही नसीब हुई। कहने को तो ये एक-आद कविता गढ़ लें के ये ख़ुश हैं क्योंकि ‘वो’  ख़ुश हैं, पर घंटा खुश हैं ये कवि।मेरे प्यारे कवि,तुम्हें मेरा फ़िर से नमन।

ख़ैर,चोट खाये हुए कवियों की तादाद ज़्यादा है। केवल यही लोग हैं जो मुझे बड़ी ईमानदारी से अपने ज़ख्म उजागर करते हुए दिखते हैं। वापस आते हैं असल बात पर,जब मैं कहता हूं कि मुझे प्यार नहीं दिखता तो इसका मतलब है कि मुक्कमल प्यार। यहां मेरे प्रिय कवि भी हार चुके हैं। 

मुझे प्यार कतई नहीं दिखता,दिखाई देता है तो सिर्फ एक आईडिया जिसके पीछे भागती है भीड़। जिसे बचपन से यही बताया गया है कि प्यार होता कैसे है। लोग उन बातों के पीछे भागते हैं,प्यार के नहीं।

“अरे मियां,ये तो बस हो ही जाता है “

अहम-अहम,हो ही जाता होगा,मोये का मालूम? मैं ठहरा गवार। 

पर ये सब बातें आज से पहले की हैं।

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इस गवार को आज सुबह से पहले ज्ञात नहीं था कि सिर्फ एक मंज़र ही काफ़ी होता है फ़लसफ़ा ज़ेहन में बैठाने के लिए।इस गवार ने आज कुछ देखा। 

बात है सुबह की,ये गवार अपनी बेहद बोरिंग ज़िन्दगी की दिनचर्या के बीच में था। 

गवार की क्रिया अनुसूची : उठना,लाइब्रेरी में पढ़ना, कोचिंग जाना,फ़िर लाइब्रेरी में पढ़ना और वापस घर की ओर प्रस्थान करना।

ज़ाहिर सी बात है इस सूची में सफ़र का काफ़ी महत्व है। 

मेट्रो में 2 घण्टे तो निकलते ही हैं। तरह-तरह के लोग दिखते हैं। बाहों में बाहें फ़ैलाये प्रेमी युगल भी।  

ये साला प्यार क्यों नहीं दिखता ?

क्योंकि मैं गवार हूँ।

मैंने जो बचपन से  देखा है उससे इतना ही जाना है कि इंसान को  खूबसूरती भाती है। हम प्यार में हैं क्योंकि दूसरा खूबसूरत है। वो अगर क्लासी निकले तो क्या ही बात। मैं इसका दोषी हूँ, पर मैं ठहरा गवार!

जल्दी ही उबर गया। इस गवार को बहुत जल्द एहसास हो गया कि बेटा वो जो तुम्हें हुआ है ना वो कॉन्सेप्ट से लगाव हुआ है,ये प्यार वगैरह तुम्हारे बस में नहीं। 

तुम्हें बताया गया था कि प्यार में पड़ने का सबसे पहला स्टेप होता है सफेद चेहरा ढूंढना। (यहाँ पर ज़ोरदार हमला हो चुका है,समझ लो)

मैं आज यही ऐंठ लिये घूम रहा था कि ये सब धोखा है,लोगों को भी प्यार नहीं होता/दिखता, बस अपने आप को सांत्वना देने के लिए मुखौटा ओढ़े ख़ुश हैं। 

हमेशा की तरह आज भी सफ़र कर रहा था।एक लड़का और लड़की साथ में हंस रहे थे और दोनों ने चश्में लगाए हुए थे,काले चश्में। पर आज कुछ अलग हुआ,आज मेरे अंदर खुजली नहीं हुई उन्हें प्रेमी युगल घोषित करने की और उनसे तुरंत ध्यान हटाने की जो मैं हमेशा करता हूं।

उनके चेहरे पर थी असीमित मुस्कान जो इतनी ईमानदार थी कि मैं भी मुस्करा पड़ा।  

उनका चश्मे पहनकर एक दूसरे की ओर बिना देखे बतियाना और मुस्करा जाना इस गवार को पसंद आया और इतना पसंद आया कि फोन में रॉक से सीधा स्लो संगीत बजने लगा।

गौर करने की बात ये थी कि दोनों ने इस पूरे वक्त एक दूसरे का हाथ पकड़ रखा था जो बता रहा था कि ये वो ‘सफेद’ वाला नहीं है। ये भरोसे वाला था जानी।

उनकी केमिस्ट्री देखते ही बन रही थी। फ़िर अगले स्टेशन से पहले आवाज़ गूंजी ” अगला स्टेशन विश्वविद्यालय है..”। वो एक दूसरे का हाथ थामे,एक दूसरे पर भरोसा रखते हुए गेट की ओर आगे बढ़े।

बेहद शांत तरीके से छड़ी हाथ में लिए आस-पास की चीज़ों को महसूस करते हुए वो आगे निकल गए। 

कहने को तो मुझे अगले स्टेशन पर उतरना था पर इस गवार पर आज उसका बस नहीं था। 

पहले सीढ़ियां और फ़िर निकास द्वार,मुस्कराते हुए,खिल-खिलाते हुए,चह-चहाते हुए,एक दूसरे का हाथ थामकर उन्होंने पार किया और मैं बस उन्हें देखता रह गया। 

हां, उन दोनो को आंखों की रौशनी को गए अरसा हो चुका था। हां,वो सबसे ज़रूरी चीज़ देख सकते थे।

ये वो लोग थे जो इस गवार को ज़िन्दगी भर की सीख दे गए,ये वो लोग थे जो इस गवार को दृष्टि दे गए। 

ये वो थे जिन्होंने प्यार शब्द को लड़का-लड़की से परे एक बेहद जनरल पहलू दिया।

ये वो थे जिन्होंने शायद कभी कांसेप्ट के बारे में सुना ही न हो,इन्होंने बस भरोसा कमाया था।

ये वो थे जो देख सकते थे।

मुझे पहले इसपर हँसी आती थी क्योंकि मैं ठहरा गवार!

Dear Future Dad

Dear future dad,

By the time you read this,you would have breached major obstacles in your life. You probably have a happy married life. And as per the generic norm ,you prayed your heart out for a child daughter. And while you’re all preparing for this lovely thing called fatherhood,kindly walk a different path,a righteous one.

While you’re about to shower fatherly love,you mustn’t bound it with  the decade old jurisdiction which prevailed a century before that.

Don’t feed your ‘angel’ sexism in the name of love. Feed her courage,feed her strength,feed her the wisdom that a generic father feeds  to his warrior lad . Tell her that she can very well  be the beauty and the beast. Tell her that waiting for charming bloke in the golden carriage is one thing that an independent human doesn’t dream of. 

And while she grows her way out of the patriarchal society,you tell her that she can go and rock that 360 turn on the pitch. You have your Fifa battles with her while she beats you amidst all the dad affection.

You tell her about the legends of your time that how the country of 1.2 billion people cheered for an olympic gold which was all rested on a majestic woman. How it were only those 4 women who inspired hope for medals. You better proudly tell her about India’s greatest boxer of all time,the magnificent Mary.

Don’t let her believe that she can’t be a geek just because she can’t see any geek to look upto. Enlighten her about the world’s first programmer and also about the person whose code landed humans on moon. 

Develope her into a color blind human who knows no skin privilege. Tell her about the wrongs of our forefathers; their unbendable ignorance.
Tell her to vibe with beautiful souls rather than ugly armours. Tell her that attachment is a thing of beauty,a cherishable experience which can’t be compromised with caste,colour,creed and religion.

And most importantly,you be her ultimate escape from sorrows,the one she shares coarse time with. 

You be the dude to her dad.

Precisely,briefly requested.

-You

Shades

Have you ever felt so

Comfortable in your

Blacks

And in your

Whites

That you can’t fathom slight tint of

Grey ?

Have you ever enjoyed the

Warmth of nonchalant

Blues

And the serenity of

Maroons

Just to complacently 

Defy the songs of

Yellow? 

Have you ever longed for 

The despicable 

Scarlets

And the lusty 

Lilacs

To smudge your soul

Crimson?

Have you?

खीज

डगर कोई खोजे,

मेरे तलवों में छाले पड़े हैं।

थक गया हूँ मैं,

बस पैर संभाले खड़े हैं

दिखी है एक दुर्बल

लाचार सी बुढ़िया

दिखी है वो रस्ते में 

दुहाई ऊपरवाले की देती

दिखी है एक माँ भी

और दिखा एक बच्चा

दिखें हैं वो भी बद

बेबस राहों में फिरते

दिखे हैं हाड मास के

चलते फिरते लम्बरदार

दिखे हैं उनको

नज़रबंद करते ठेकेदार

दिखा है ख़रीददारी पर

खड़ा एक मज़हब

दिखा है गरीबी पर

लाचार एक मज़हब

दिखा है व्यापार

जिसमें बिचता है धर्म

दिखी है लूट

जिसमें धूमिल है धर्म।

मस्जिद दिखी है,

शिवाले दिखे हैं,

रेशम की चादर 

चाँदी के थाल दिखे हैं।

न दिखे कोई अल्लाह,

भगवान छिपे हुए हैं,

मोमबत्ती की रौशनी में,

ईशु भी गायब हुए हैं।

धर्म दिखा है,

सिपाही दिखे हैं,

ग्रंथ दिखे हैं,

अंधे राही दिखे हैं।

काज़ी दिखे हैं

फ़तवे दिखे हैं

योगी दिखे हैं

कि नेता दिखे हैं

मैं देखूं सबको और सोचूँ यही,

पूछूँ या नहीं ,सवाल ‘वही’..

पर अब मेरे तलवों में छाले पड़े हैं                                 थका हूँ,बस पैर संभाले खड़े हैं।                      

प्रमाण

वो अच्छा लिखता है,

वो बहुत अच्छा लिखती है

सबसे अच्छा ? 

नहीं। बिल्कुल नहीं।

मैं ऐसी किसी भी धारणा को ख़ारिज करता हूँ। मुझे नहीं लगता “सबसे अच्छा लेखन” जैसी कोई चीज़ होती भी है।

आप कला को जज करते हैं ,कैसे करते हैं इसके तीन सौ तरह तरीके हैं! कौन सबसे बेहतरीन हो इसका कोई सार्वलौकिक मापदंड नहीं हो सकता। इसका जवाब कलाकार की लोकप्रियता से ही नहीं आंका जा सकता। अब दुबारा पढ़िए, मैंने यह नहीं कर रहा कि लोकप्रिय धुरंधर बेहतरीन लेखन नहीं करते,बल्कि सबसे बेहतरीन कौन है इसका कोई सीधा-साधा प्रमाण नहीं है। न जाने कितने लोग हैं इस दुनिया में जो कला के प्रेमी हैं और न जाने कितनी अनुभूतियां। किसको क्या भा जाए,किसकी क्या शैली हो..इस पर आप अनुभूति का ठप्पा लगाइये,आंकलन का नहीं। 

किसी को शब्दावली का खेल पसंद है,कोई बिना भाव समझे नाज़ी बनने की होड़ में रहता है (ऐसे लोगों से दूर ही रहें)और कोई मेरे जैसा हो तो वो कंटेंट का प्यासा रहता है,जिसे थोड़ा लीक से हटकर..कुछ अलग सोचने में मज़ा आता हो।

स्पर्धा अच्छी बात है पर ऐसी स्पर्धा जो किसी को आपके ऊपर हक़ जताने की ताक़त दे,आपके ऊपर अभिमुल्यन तरस के रूप में बरसाने को उतारू हो..उससे राम राम। 
 सीधे सीधे बोलूं तो : 

ART IS SUBJECTED TO APPRECIATION NOT JUDGEMENT.

आप लिखते हैं और अगर आप दूसरों का लिखा हुआ निरंतर पढ़ते हैं तो एक वक्त आयेगा जब आपको खुद लगेगा कि आप कहां चूक रहे हैं या आपको किस क्षेत्र में सुधार की ज़रूरत है। ये फेसबुक,इंस्टाग्राम के लाइक्स नहीं बताएंगे कि आप कितने अच्छे कवि हैं। आप बस लिखते जाइये और खूब लिखते जाइये क्योंकि यही आपके बस में है और इसी में आपने सुख पाया है..

सबसे अच्छी चीज़ हम लेखकों और कवियों के लिए कोई है तो वो है लेखन..एकदम अद्वितीय।

-नितिन “संक्षेप में” चौहान।




Art

Unlike my last act of sanity ,where everything required consent,this was different.This defied pragmaticism. 
I swam through..all the way through,fighting my dizzy senses with utmost glibbery,just to ascend my conscious form.

With unserene thoughts joining cynicism in colossal range,I had a perfect recipe of kissing death,several times.

An enigma had my demons beg for more,crave for more.Poised with the unbounded falsary ,I didn’t want to understand.

I let go of myself,melted into the intimidating scenery.

I fell for the art in her.

Didn’t know my fear was the last thing I’d be begging to face. Didn’t want to understand.

I fell for the art in her.

Never saw the moving poetry,never was lucky enough. Never saw rage as a poetic device,never was disgusted by the quiescence. Never wanted to slip into the depths of puzzles. Never wanted to not to understand it.

I fell for the art in her.

And then I open my eyes only to realize that the fight of fighting reality with dreams was a fiction too.

Time demands seclusion and nonchalant environment for sinking the sadness in,but she won’t let me do it.

I truly fell for the art in her.

She is permanently tattooed in my mind,inscribed on my soul and framed in my heart like a photograph.

Funny thing this mind,creates a perfect memory and fiction.

So when I close my eyes,she is there. 

She is there..still in a photograph taking me far away from the very reality I despise.

I too had a dream..

Stagnant


Four walls,some books and a complete state of denial.

That’s how a day passes by. That’s how past 10 days have been. Four walls,four white walls and to be found on them are shabby scribbles out of exasperation. Four walls which are concrete,encompassing an unhinged intellect. Some books,some highly unlikable books scattered around stamping authority over my motion. Some books which decide the course,thus resulting in a lazy day and an even lazier night ,perishing to procrastination.

How well has this body misfitted in the pattern which has been an absolute Déjà vu for some days?

A despicable truth of reality always supersedes the notion of a concerned future;a mere work of fiction.

You don’t have to spend loads of energy to feel exhausted. Apparently, hopelessness is enough. How do I not oppose it ? To least of my amazement,I am comfortably resisting any help. A low functioning sociopath is what I have become. Can never relate to the universal idea of happiness but I do find Eurus quoting “Happiness is a pop song, sadness is a poem” highly sexy.However, in the midst of constant denial,I shall breathe for I am bit stagnant but not rotten.

के था के नहीं

ये जो था

जो घड़ी दर घड़ी 

इंतज़ार में बढ़ रहा था

जो दिल में तरस और

आंखों में प्यास सा

पनप रहा था

दिनचर्या में शामिल होके

दिनचर्या सा बन रहा था

प्यार था के नहीं था ?
ये जो था

किताबी आशिक़ी से परे

फ़िल्मी देखाव से अन्य

एक टूटी सी 5 इंच की

बद पर बेहद प्रिय

खुरदुरी स्क्रीन में 

सादा पर विशिष्ट मैसेज सा

ये जो था

प्यार था के नहीं था ?
ये जो था 

आत्मा को तीक्ष्ण करती 

दिल्ली की धूप में 

स्टैंड पर बाट जोह

डीटीसी की राह में

धक्कों में दबी उत्सुकता में

जज़्बात से हारी दुर्गति में

हर रोज़ विशुद्ध प्रयास में

एक झलक की आस में

ये जो था

प्यार था के नहीं था ?
ये जो था

नहर से नदी

नदी से सागर बनने तक

नज़्म पढ़ ,नज़्म लिख

तुम्हें नज़्म बनाने तक

खुद को तबाह कर

खुद से ईजाद पाने तक

ये जो था

ये जो सफ़र था

प्यार था के नहीं था ?