के था के नहीं

ये जो था

जो घड़ी दर घड़ी 

इंतज़ार में बढ़ रहा था

जो दिल में तरस और

आंखों में प्यास सा

पनप रहा था

दिनचर्या में शामिल होके

दिनचर्या सा बन रहा था

प्यार था के नहीं था ?
ये जो था

किताबी आशिक़ी से परे

फ़िल्मी देखाव से अन्य

एक टूटी सी 5 इंच की

बद पर बेहद प्रिय

खुरदुरी स्क्रीन में 

सादा पर विशिष्ट मैसेज सा

ये जो था

प्यार था के नहीं था ?
ये जो था 

आत्मा को तीक्ष्ण करती 

दिल्ली की धूप में 

स्टैंड पर बाट जोह

डीटीसी की राह में

धक्कों में दबी उत्सुकता में

जज़्बात से हारी दुर्गति में

हर रोज़ विशुद्ध प्रयास में

एक झलक की आस में

ये जो था

प्यार था के नहीं था ?
ये जो था

नहर से नदी

नदी से सागर बनने तक

नज़्म पढ़ ,नज़्म लिख

तुम्हें नज़्म बनाने तक

खुद को तबाह कर

खुद से ईजाद पाने तक

ये जो था

ये जो सफ़र था

प्यार था के नहीं था ?

Advertisements