/सिर्फ मर जाना ही मरना नहीं होता/

ख्वाबों के बक्से को ताला मार

जब आँखें मूंद कोई सोता है

तब वह थोड़ा मरता है

खीज में जी कर ख़ुद को भुलाकर

जब ख़ुदी में छिप कोई खोता है

तब वह थोड़ा मरता है

आईने में एक चहकता बच्चा देख

जब उम्र के बीज कोई बोता है

तब वह थोड़ा मरता है

टहनी से गिरा एक पुष्प लाचार सा

जब मुसाफ़िर की बाट कोई जोहता है

तब वह थोड़ा मरता है

मर्दों की बसाई इस दुनिया में

जब कोने में बिखर कोई रोता है

तब वह थोड़ा मरता है

नैतिक दबाव में परछाईं भी भूल

जब अस्तित्व का भार कोई ढोता है

तब वह थोड़ा मरता है

दिल से दिल के शातिर व्यापार में

जब इंसा से पुतला कोई होता है

तब वह थोड़ा मरता है

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के था के नहीं

ये जो था

जो घड़ी दर घड़ी

इंतज़ार में बढ़ रहा था

जो दिल में तरस और

आंखों में प्यास सा

पनप रहा था

दिनचर्या में शामिल होके

दिनचर्या सा बन रहा था

प्यार था के नहीं था ?
ये जो था

किताबी आशिक़ी से परे

फ़िल्मी देखाव से अन्य

एक टूटी सी 5 इंच की

बद पर बेहद प्रिय

खुरदुरी स्क्रीन में

सादा पर विशिष्ट मैसेज सा

ये जो था

प्यार था के नहीं था ?
ये जो था

आत्मा को तीक्ष्ण करती

दिल्ली की धूप में

स्टैंड पर बाट जोह

डीटीसी की राह में

धक्कों में दबी उत्सुकता में

जज़्बात से हारी दुर्गति में

हर रोज़ विशुद्ध प्रयास में

एक झलक की आस में

ये जो था

प्यार था के नहीं था ?
ये जो था

नहर से नदी

नदी से सागर बनने तक

नज़्म पढ़ ,नज़्म लिख

तुम्हें नज़्म बनाने तक

खुद को तबाह कर

खुद से ईजाद पाने तक

ये जो था

ये जो सफ़र था

प्यार था के नहीं था ?