खीज

डगर कोई खोजे,

मेरे तलवों में छाले पड़े हैं।

थक गया हूँ मैं,

बस पैर संभाले खड़े हैं

दिखी है एक दुर्बल

लाचार सी बुढ़िया

दिखी है वो रस्ते में 

दुहाई ऊपरवाले की देती

दिखी है एक माँ भी

और दिखा एक बच्चा

दिखें हैं वो भी बद

बेबस राहों में फिरते

दिखे हैं हाड मास के

चलते फिरते लम्बरदार

दिखे हैं उनको

नज़रबंद करते ठेकेदार

दिखा है ख़रीददारी पर

खड़ा एक मज़हब

दिखा है गरीबी पर

लाचार एक मज़हब

दिखा है व्यापार

जिसमें बिचता है धर्म

दिखी है लूट

जिसमें धूमिल है धर्म।

मस्जिद दिखी है,

शिवाले दिखे हैं,

रेशम की चादर 

चाँदी के थाल दिखे हैं।

न दिखे कोई अल्लाह,

भगवान छिपे हुए हैं,

मोमबत्ती की रौशनी में,

ईशु भी गायब हुए हैं।

धर्म दिखा है,

सिपाही दिखे हैं,

ग्रंथ दिखे हैं,

अंधे राही दिखे हैं।

काज़ी दिखे हैं

फ़तवे दिखे हैं

योगी दिखे हैं

कि नेता दिखे हैं

मैं देखूं सबको और सोचूँ यही,

पूछूँ या नहीं ,सवाल ‘वही’..

पर अब मेरे तलवों में छाले पड़े हैं                                 थका हूँ,बस पैर संभाले खड़े हैं।                      

प्रमाण

वो अच्छा लिखता है,

वो बहुत अच्छा लिखती है

सबसे अच्छा ? 

नहीं। बिल्कुल नहीं।

मैं ऐसी किसी भी धारणा को ख़ारिज करता हूँ। मुझे नहीं लगता “सबसे अच्छा लेखन” जैसी कोई चीज़ होती भी है।

आप कला को जज करते हैं ,कैसे करते हैं इसके तीन सौ तरह तरीके हैं! कौन सबसे बेहतरीन हो इसका कोई सार्वलौकिक मापदंड नहीं हो सकता। इसका जवाब कलाकार की लोकप्रियता से ही नहीं आंका जा सकता। अब दुबारा पढ़िए, मैंने यह नहीं कर रहा कि लोकप्रिय धुरंधर बेहतरीन लेखन नहीं करते,बल्कि सबसे बेहतरीन कौन है इसका कोई सीधा-साधा प्रमाण नहीं है। न जाने कितने लोग हैं इस दुनिया में जो कला के प्रेमी हैं और न जाने कितनी अनुभूतियां। किसको क्या भा जाए,किसकी क्या शैली हो..इस पर आप अनुभूति का ठप्पा लगाइये,आंकलन का नहीं। 

किसी को शब्दावली का खेल पसंद है,कोई बिना भाव समझे नाज़ी बनने की होड़ में रहता है (ऐसे लोगों से दूर ही रहें)और कोई मेरे जैसा हो तो वो कंटेंट का प्यासा रहता है,जिसे थोड़ा लीक से हटकर..कुछ अलग सोचने में मज़ा आता हो।

स्पर्धा अच्छी बात है पर ऐसी स्पर्धा जो किसी को आपके ऊपर हक़ जताने की ताक़त दे,आपके ऊपर अभिमुल्यन तरस के रूप में बरसाने को उतारू हो..उससे राम राम। 
 सीधे सीधे बोलूं तो : 

ART IS SUBJECTED TO APPRECIATION NOT JUDGEMENT.

आप लिखते हैं और अगर आप दूसरों का लिखा हुआ निरंतर पढ़ते हैं तो एक वक्त आयेगा जब आपको खुद लगेगा कि आप कहां चूक रहे हैं या आपको किस क्षेत्र में सुधार की ज़रूरत है। ये फेसबुक,इंस्टाग्राम के लाइक्स नहीं बताएंगे कि आप कितने अच्छे कवि हैं। आप बस लिखते जाइये और खूब लिखते जाइये क्योंकि यही आपके बस में है और इसी में आपने सुख पाया है..

सबसे अच्छी चीज़ हम लेखकों और कवियों के लिए कोई है तो वो है लेखन..एकदम अद्वितीय।

-नितिन “संक्षेप में” चौहान।




के था के नहीं

ये जो था

जो घड़ी दर घड़ी 

इंतज़ार में बढ़ रहा था

जो दिल में तरस और

आंखों में प्यास सा

पनप रहा था

दिनचर्या में शामिल होके

दिनचर्या सा बन रहा था

प्यार था के नहीं था ?
ये जो था

किताबी आशिक़ी से परे

फ़िल्मी देखाव से अन्य

एक टूटी सी 5 इंच की

बद पर बेहद प्रिय

खुरदुरी स्क्रीन में 

सादा पर विशिष्ट मैसेज सा

ये जो था

प्यार था के नहीं था ?
ये जो था 

आत्मा को तीक्ष्ण करती 

दिल्ली की धूप में 

स्टैंड पर बाट जोह

डीटीसी की राह में

धक्कों में दबी उत्सुकता में

जज़्बात से हारी दुर्गति में

हर रोज़ विशुद्ध प्रयास में

एक झलक की आस में

ये जो था

प्यार था के नहीं था ?
ये जो था

नहर से नदी

नदी से सागर बनने तक

नज़्म पढ़ ,नज़्म लिख

तुम्हें नज़्म बनाने तक

खुद को तबाह कर

खुद से ईजाद पाने तक

ये जो था

ये जो सफ़र था

प्यार था के नहीं था ?

जब

जब दर-दर ढूंढे आशियाने को

जब आग लगे मैख़ाने को,

जब मय ही पानी-पानी हो

जब मारी सूख जवानी हो,

तब हौले से आवाज़ दियो

बस हौले से आवाज़ दियो।

जब बिन तौले आंसू टपके

जब बिन बोले आँखे झपके,

जब रास ना आये सूरज भी

जब रात न बांधे धीरज भी,

तब हौले तू जिगर उठा जइयो

बस हौले तू जिगर उठा जइयो।

जब राख़ दिखे मंज़िल धूमिल

जब सजदे डूबे,न हों कामिल,

जब रस्ते दूर बैरागी हों

जब अंतर्मन ही बागी हो,

तब हौले तू अलख जगा जइयो

बस हौले तू अलख जगा जइयो।

जब लहु नसों में शांत रहे

जब आतिश तेवर एकांत रहे,

जब समझ बिखरी वीरानी हो

जब थमी पड़ी मनमानी हो,

तब हौलेे तू अहम बना जइयो

बस हौले तू अहम बना जइयो।

जब डोले धरातल साहसी का

जब डिगे हौसला प्रयासी का,

जब निर्मम समय निकासी हो

जब तन क्षीण अविश्वासी हो,

तब हौले से आवाज़ दियो

बस हौले से आवाज़ दियो।

अनन्त

सुबह मैं उठता तो हूँ,

पर अकेला नहीं,

मैं गिरकर उठने के प्रयास में

फ़िर गिर जाता हूँ,

मुझे गिराया जाता है,

घसीटा जाता है,

उठाया भी जाता है।

ये शीशे भी सच नहीं बोलते,

मैं दिखता तो हूँ,

पर अकेला ही,

शरीर पर कुछ निशान हैं,

उभरे से ये निशान चीख रहे हैं,

मुझे बता रहे हैं कि,

मैं रात को जैसे तैसे सोया तो था,

पर अकेले नहीं।

मैं थक गया हूँ,

सुबह से अबतक बस दौड़ा ही हूँ,

मैं बचपन से दौड़ ही रहा हूँ,

मैंने बचपन से सबको रेस में हराया है,

सबको..उसे छोड़कर,

मैं आज भी उससे हारता हूँ,

मेरे साये भी अंधेरे में भाग जाते हैं,

मगर वो है कि टस से मस नहीं होता!

मैं रुक भी तो नही सकता,

मुझे बर्दाश्त नहीं उसकी जीत,

मैं बस जीत ही नहीं पाता,

मैं थक गया हूँ।

सब मुझे कोसते आये हैं,

सब वो नहीं देखते जो 

इस देह से परे है,

इस खाल से परे है,

सबकी नजरें बोलती हैं,

आज तक बोलती हैं,

वो लड़की भी तो थी,

आज भी वो लड़की मुझे कोसती है,

आज भी उसका मुझसे मिलना बाकी है,

मेरे दोस्त नहीं है,

बस कुछ लोग हैं जो पहचान जाते हैं,

कुछ लोग जो बस पहचानना नहीं चाहते!

आज भी मेरी पहचान अनन्य नहीं।

हाँ,

वो मुझसा दिखता है,

आवाज़ भी मेल खाती है,

आंखों का रंग और

चाल भी समान है,

वो निशान उसके शरीर पर भी हैं।

वो भी गिरता है,

और गिरकर उठने के अथक प्रयास में

फिर से गिर जाता है,

बस वो मैं नहीं..

वो मैं नहीं,

मेरा अनन्त संघर्ष है।

स्त्रोत : गूगल इमेजेस 

फ़िल्म : स्प्लिट

ये दिल्ली..

निकलता हूं सड़क पे

जब दिल्ली की,

कोसता हूं,

कि गर्मियां दिल्ली में इतनी गर्म क्यों हैं?

पानी प्रदूषित और

हवा में ज़हर के साथ उदासी क्यों है?

बस्ते टांगे लोग स्टैंड पर खड़े,

भागम-भाग कर रहे हैं,

खींच-तान,गाली-गलौज और 

पसीने के साथ अपनी अदब भी बहा रहे हैं,

ये दिल्ली में इतना गुस्सा क्यों है? 

शक्ल से पहचान जाने का ये अजब हुनर,

कौन बिहारी,कौन पहाड़ी,

कोई दिल्ली से क्यों नहीं है? 

वो दुपट्टा ओढ़ी है,

नज़र और धूप,दोनों से बचने के लिये

कि इधर से सीटी बजी बाइक से,

ये लाल बत्ती सबके लिए हरी क्यों नही होती? 

जीन्स ऊपर एड़ी के,और लोफर में आये

ये जाट,मुआवजे का रौब दिखा रहे,

इलेक्शन में हुड़दंग मचा रहे हैं,

ये वर्दी होकर भी वहाँ क्यों नहीं होती? 

किसी ने गाली दी किसी को,

किसी को सुनकर बुरा लगा,

किसी ने जड़ दिए दो चार,

और किसी ने तो जान ही ले डाली,

सस्ती से ये जान यहां कभी महँगी क्यों नहीं होती? 

पढ़ाई में राजनीति तो है,

राजनीति में पढ़ाई नहीं,

कोई जे.एन.यू से लाल सलाम दे,

कोई भगत सिंह से भगवा लहराए,

आज़ादी के मापदंड गिनाए,

कोई हिंदुत्व को प्रचंड दिखाए,

अंधो की इस नगरी में कोई सुनवाई भी क्यों नहीं होती? 
शायद करोड़ो को पालती..
यह छोटी सी दिल्ली,

दिल वालों ..बहुत बड़े दिलवालों के दम पर टिकी है।